Monday, 23 December 2013

अन्जानी सी धरती पर
विरानी सी सजती
एक भव्य विराट उन्मेष
सौँधी सी ख़ुशबू पर
वारी न्यारी द्वेष
किसी वीरा या कुँवर की
सादा या भँवर

ज्योँ का ज्योँ रंग
भीगा स् जन उमंग
सागर सी लहराई
विह्वल हो सकुचाई

क्या संग क्या अंतरंग
विगत स्वभाव सौजन्य ही
चरमराई अनभिज्ञ सी
विविधता को समेटे
अंजलि की रेखाओँ ने
अभावोँ को सहेजा
अतिशय समय सीमाओँ ने

कहीँ अजब कहीँ विजय सी
शैल पाई दुर्लभ सी

निर्झर की चाह झरने की
श्रंगार भद्र वसन की
इच्छित वर वरन् दो कि
स्वागत हो शरणागत की

सौन्दर्य वैभव विभाजित
गुण दोष विवाहित

अहं सी समर्पित
व्यर्थ रोम रोम ,गुँजता सा
परहित का समावेश
व्यंजना ,पर अग्रिम
एक ही एकाग्रता को
जागती आँखोँ का स्वप्न

निर्मल आत्मा का विभोर
रागोँ का मिश्रित रुप
वैधव्यता की राई थी
पथरीली भी बंजर भी
विषयोँ का समंदर भी
एक ही बादल की बूँद
व्यथित ह्रदय सी गूँज

सीधे सादे आमरण का
वक्तव्य रुप हठीला
क्षणभंगुर -सा क्षण
अलंघ्य पर्वत की सीमा

विराना ही आवरण था उस
अन्जान सी धरातल पर ।

***** निशा चौधरी ।

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