Sunday, 15 December 2013

वो तार तार हुई
बार बार हुई
क्यूँ जीवन उसका
पहाड़ सा
क्यूँ उसपे इतने ज़ुल्म
जिसका वो शिकार हुई
वो बहन है ,
माँ है ,
बेटी है
किसी की
तो क्योँ
उसको डोली के बजाए
दहशत मिली
तो क्योँ
उसको इज़्ज़त के बजाए
नफ़रत मिली

हम सब ऋणी हैँ
दोषी हैँ
उस जान के
जो लुट गई
भरी बाज़ार है
वो दामिनी भी है
वो नन्ही सी बच्ची भी है
और
मुँबई की
फ़ोटोजर्निलिस्ट भी है


ये आग हम सब को अंदर ही अंदर जला रही है ।कि ये वारदातेँ शाँत क्योँ नहीँ हो रहीँ हैँ । क्योँ हर बार इतने सारे हंगामेँ के बाद चुप करा दिया जाता है बार बार हमेँ सांत्वना दे कर । कानून लाएंगे कौन सा कानून की सेक्स की उम्र कितनी होनी चाहिए! जो सरकार सेक्स और बलात्कार मेँ कोई अंतर नहीँ समझती वो क्या कोई कानून बनाएगी बलात्कार के विरुद्ध और क्या दोषियोँ को सज़ा देगी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का जोक तो सुना ही चुकी है हर बार , बार बार , कई बार


¤¤¤ निशा चौधरी ।