Tuesday, 31 December 2013

तुम और मैँ

न तुम विश्वकोष के परिचायक हो
न मैँ परिज्ञान की देवी
तो इस पराभाव के आस्वादन को
न तुम झेलो , न मैँ झेलूँगी

तुम्हारे उस मिथ्य स्वभाव की
दृश्यवत्ता आह्लाद बनी थी
......तुम्हारे लिए
परन्तु मेरे तो भावोँ का
उन्मूलन ही था
अब प्रत्यक्ष मैँ तुम्हारे हूँ
तुम ही ले लो निर्णय
निष्पक्ष तुम्हारा
ये मैँ नहीँ
मेरे उस मृत भाव का क्रंदन है
जो उपहार तुम्हारा ही था
मेरे लिए
अब वापस लौट नहीँ सकती
उस तिरस्कृत युग मेँ
जो स्वप्न तो था परन्तु
मुझे मिला
सम्यक आडंबर की तरह
छल की पराकाष्ठा की तरह

तो लो अब मैँ भी
इस क्रंदन.... इस रुदन
को रोकती हूँ
स्वप्न को तोड़ती हूँ
आडंबर को भेदती हूँ
कभी जो करुणा का पर्याय बनी थी
दया की प्रतिमूर्ति थी
आज तुमसे मुख मोड़ती हूँ
हर बंधन को तोड़ती हूँ......... ।

॰॰॰॰ निशा चौधरी ।