Sunday, 15 December 2013

उस रूह को मिटाने का
सुकुन ही कुछ और था
जो मेरे अंदर थी
एक कील की तरह
चुभती थी ......
उसकी आँहेँ

वो आकाश के सिरे पर
जा कर टूट जाती थी
फिर
बिखरी हुई नीचे आती
समेटती ख़ुद को
मगर गाँठ सी बन गई थी
हर जुड़ाव पर
टूटे हुए टुकड़े चुभते बार बार

सिरहाने मेरे....... उस रूह की एक ज़ेरोक्स कॉपी आज भी पड़ी है........

॰॰॰॰॰ निशा चौधरी ।