Sunday, 15 December 2013

स्वयं की प्रतीक्षा मेँ
आँखेँ जाग रहीँ रात भर
नीँद आती
पर बिना कुछ कहे
चली जाती
कभी कभी मेरे साथ
वो भी जगी रही
सहायक बनी रही मेरी
पूरी रात
शायद उसे भी
नीँद नहीँ आ रही
या शायद वो भी
उस क्षण को
खोना नहीँ चाहती
जिसमेँ मैँ स्वयं से मिलूँगी

सदियाँ बीत गई
मगर यह तथ्य ना बदला
कि '' मैँ '' को हमेशा
स्वयं की ही
तलाश होती है ।

¤¤¤¤ निशा चौधरी ।
नफ़रत
यूँ ही रहने दो
अपनी आँखोँ मेँ
इन्हेँ देखकर अच्छा लगता है
अच्छा लगता है कि
नफ़रत ही बन कर सही
आख़िर हूँ तो इनमेँ

¤¤ निशा चौधरी ।
ऐ ज़िन्दगी ,
माना कि तुम्हारे बिना साँसेँ नहीँ है धड़कन नहीँ है
फिर भी मगर मर कर भी अमर है कई ज़िन्दगी
तो हाथ छुड़ाने से पहले सोच लो कि
साथ निभाने मेँ फायदा तुम्हारा ही है ।

¤¤ निशा चौधरी ।
आकाश की गहराई
डूब जाती है
ख़ुद के ही
शून्य मेँ

चहलकदमी करती
उसकी सीमाएँ
स्थानांतरित होती हर बार

¤¤ निशा चौधरी ।
एक स्वच्छंद आसमान
खोता नहीँ......
पाता जाता है....
बहुत कुछ
उस खुली धरती की
फैली बाज़ुओँ मेँ
समाया ब्रह्माण्ड

आरंभ का प्रारंभ
अंत का अंत
सत्य का सत्य
और
मिथ्या का मिथ्य
सुख का सुख
और
दुख का दुख
सब वृक्ष की टहनियाँ
या अलंकार
संभव का संभव होना
या
असंभव का असंभव होना
ग्राह्य हर क्षण
है भी नहीँ भी
विद्रोही मन या संतोषी मन
द्वंद्व की धरा चीरते पग पग
झकझोरता धिक्कारता
सबलता या निर्बलता
भाव की पृष्ठभूमि
अभिव्यक्ति की भूमिका

बस प्रतिबंध नहीँ

॰॰॰॰॰ निशा चौधरी ।
उस रूह को मिटाने का
सुकुन ही कुछ और था
जो मेरे अंदर थी
एक कील की तरह
चुभती थी ......
उसकी आँहेँ

वो आकाश के सिरे पर
जा कर टूट जाती थी
फिर
बिखरी हुई नीचे आती
समेटती ख़ुद को
मगर गाँठ सी बन गई थी
हर जुड़ाव पर
टूटे हुए टुकड़े चुभते बार बार

सिरहाने मेरे....... उस रूह की एक ज़ेरोक्स कॉपी आज भी पड़ी है........

॰॰॰॰॰ निशा चौधरी ।